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Sunday, May 25, 2014

अहमद फराज के गजल :-


वो चांद जो मेरा हमसफर था
दूरी के उजाड़ जंगलों में
अब मेरी नजर से छुप चुका है
इक उम्र से मैं मलूलो-तन्हा
जुल्मात की रहगुजार में हूं
मैं आगे बढूं कि लौट जाऊं
क्या सोच के इंतजार में हूं
कोई भी नहीं जो यह बताए
मैं कौन हूं किस दयार में हूं।

-- मलूलो-तन्हा = दुखी और अकेला
-- जुल्मात = अंधेरा
-- रहगुजार = रास्ते

Sunday, April 6, 2014

अहमद फराज के गजल :-


अहमद फराज के गजल :-

ऐसे चुप है कि ये मंजिल भी कड़ी हो जैसे,
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे।
अपने ही साये से हर गाम लरज जाता हूं,
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे।
कितने नादां हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे,
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे।
मंजिलें दूर भी हैं, मंजिलें नजदीक भी हैं,
अपने ही पावों में जंजीर पड़ी हो जैसे।
आज दिल खोल के रोए हैं तो यों खुश हैं 'फ़राज'
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।
-- अहमद फराज़ (मशहूर पाकिस्तानी शायर)